वीर नरसिंह ने विजयनगर में तुलुव वंश (1505-65 ई०) की स्थापना की।
8 अगस्त 1509 ई० को तुलुव वंश का महान शासक कृष्णदेवराय गद्दी पर बैठा।
पुर्तगाली यात्री डोमिगोस पायस ने कृष्णदेव राय के काल में विजयनगर की यात्रा की।
कृष्णदेव राय का काल तेलुगू साहित्य का स्वर्णकाल कहलाता है, इस काल में उसके दरबार में तेलुगू साहित्य 8 सर्वश्रेष्ठ कवि थे जिन्हें अष्टदिगगज कहा जाता था।
तेलुगू में अमुक्तमाल्याम एवं संस्कृति में जाम्बवती कल्याणम् की रचना कृष्णदेव राय ने की।
कृष्णदेव राय के दरबारी तेनालीराम ने पांडुरंग महात्म्यम् की रचना की।
हजारा एवं विट्ठल स्वामी मंदिरों का निर्माण कृष्णदेव राय ने करवाया।
आंध्रभोज, अभिनव भोज एवं आन्ध्र पितामह आदि उपाधियाँ कृष्णदेव राय ने धारण की।
राक्षसी-तंगड़ी या तालिकोटा या बन्नीहट्टी के 25 जनवरी 1565 ई० को हुए युद्ध में विजयनगर साम्राज्य का पतन हो गया।
तालिकोटा युद्ध में विजयनगर की ओर से राम राय ने हिस्सा लिया।
अरावीडु वंश
विजयनगर में चौथे राजवंश अरावीडु वंश (1570-1650 ई०) की स्थापना तिरुमल द्वारा सदाशिव को अपदस्थ करके की गयी।
अरावीडु वंश की राजधानी पेनुकोंडा में थी।
महत्वपूर्ण तथ्य
घटतेक्रम में विजयनगर की प्रशासनिक इकाई इस प्रकार थी-मंडलम् (प्रांत)-कोट्टम (कमिश्नरी)-वलनाड (जिला) नोड. (मेलाग्राम-50 ग्रामों का एक समूह)-ऊर (ग्राम)
राज्य की आय का प्रमुख साधन भू-राजस्व था जो कुल उपज का 1/6 हिस्सा लिया जाता था।
दक्षिण भारत में बसे उत्तर-भारतीय लोगों को बडवा कहा जाता था।
मनुष्यों की खरीद-बिक्री को बेसवग कहते थे।
1354 ई० के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि विजयनगर में सती प्रथा प्रचलन में थी।
राज्य के नियंत्रण वाली भूमि को भंडारवादग्राम कहा जाता था।
कृष्णदेव राय को संत वायसराय भी कहा जाता है।
विजयनगर का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह गोवा था।
कृष्णदेवराय वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
कृष्णदेवराय के राजकवि अल्सानी पेद्वन को आंध्र-कविता का पितामह कहा गया।
प्रशासनिक व्यवस्था
नायंकर व्यवस्था – चोल युग एवं विजयनगर युग के राजतंत्रों में अंतर यही नायंकर व्यवस्था है।
नोयक – विजयनगर के सेनानायकों को नायक कहा जाता था। ये नायक वस्तुतः भू-सामंत थे । जिन्हें अपने अधीनस्थ एक सेना के रख-रखाव के लिए भूमि दी जाती थी।
अमरम – नायको को दिया गया भू-खंड। इसके कारण नायकों को अमरनायक भी कहा जाता था।
आयंगार व्यवस्था – प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए प्रत्येक ग्राम को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में संगठित किया गया था। इन संगठित ग्रामीण इकाईयों के प्रशासन हेतु 12 प्रशासकीय अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी, जिन्हें वेतन के बदले लगान मुक्त एवं कर मुक्त जमीन दी जाती थी इस व्यवस्था को आयंगार व्यवस्था कहते था